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श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के पूर्व महासचिव चंपत राय को राम मंदिर चढ़ावा चोरी प्रकरण में विशेष जांच दल द्वारा क्लीन चिट मिलने पर भाजपाइयों ने अयोध्या पहुंचकर उन्हें सम्मानित किया।

फतेहगंज बरेली – युवा अंतर्राष्ट्रीय वैश्य महासम्मेलन के प्रदेश उपाध्यक्ष एवं भाजपा नेता आशीष अग्रवाल ने एक प्रतिनिधि मंडल में सुरेश बंसल, राजेश अग्रवाल, भव्य अग्रवाल के साथ अयोध्या कारसेवक पुरम में विश्व हिंदू परिषद के केंद्रीय उपाध्यक्ष एवं राम जन्म भूमि तीर्थ ट्रस्ट के पूर्व महासचिव चम्पत राय को श्री राम की मूर्ति भेंट करते हुए उन्हें श्री राम के दूत हनुमान की उपाधि देते हुए कहा कि एस आई टी की जांच रिपोर्ट में उन्हें पूरी तरह निर्दोष पाया गया है, जिससे उनके समर्थकों और संत समाज में हर्ष की लहर है। आरोपों के समय उन्होंने नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए पद से इस्तीफा दे दिया था, लेकिन सत्य की जीत के साथ ही उनके त्याग, तपस्या और सात्विक जीवन की शुचिता एक बार फिर समाज के सामने प्रमाणित हो गई है।चंपत राय जी का जीवन एक सच्चे राष्ट्र-आराधक, तपस्वी और सात्विक साधक का अनुपम उदाहरण है।

अपरिग्रह और आजीवन अविवाहित जीवन चंपत राय जी ने युवावस्था में ही राष्ट्र और भगवान श्रीराम की सेवा के लिए अपना सर्वस्व समर्पित कर दिया था। उन्होंने आजीवन अविवाहित रहने का संकल्प लिया। भौतिक सुख-सुविधाओं, धन-दौलत और पारिवारिक बंधनों से दूर उनका जीवन पूर्णतः ‘अपरिग्रही’ (संग्रह न करने वाला) रहा है। उनका पूरा जीवन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के एक निश्छल प्रचारक के रूप में बीता है, जहाँ निजी संपत्ति या बैंक बैलेंस का कोई स्थान नहीं होता। उच्च शिक्षित होने के बाद भी बिजनौर (उत्तर प्रदेश) में जन्मे चंपत राय जी शिक्षा के क्षेत्र में भी अत्यंत मेधावी रहे हैं। वे रसायन विज्ञान के प्रोफेसर थे और कॉलेज में अध्यापन करते थे। एक सम्मानित और सुरक्षित प्रोफेसर की नौकरी को त्यागकर उन्होंने तिनके जैसी सादगी को चुना और अपना जीवन प्रभु रामलला के चरणों में अर्पित कर दिया। वे आज भी एक साधारण कार्यकर्ता की भाँति ही सादा जीवन जीते हैं और मोटे सूती वस्त्र धारण करते हैं। मौन साधना और चातुर्मास व्रत उनके सात्विक और धार्मिक आचरण का सबसे बड़ा प्रमाण उनका मौजूदा आध्यात्मिक संकल्प है। राम मंदिर प्रकरण में जब उन पर आरोप लगे, तो उन्होंने किसी विवाद में पड़ने के बजाय खुद को प्रभु की शरण में सौंप दिया। वे अयोध्या के रामकोट स्थित तीर्थ क्षेत्र भवन में चार महीने की कठिन चातुर्मास साधना (एकांतवास) पर बैठ गए। इस दौरान वे रोजाना लगभग छह घंटे मौन रहकर राम मंत्र का जाप और रामचरितमानस का पाठ कर रहे हैं। यह उनकी गहरी सात्विक चेतना और ईश्वर के प्रति अटूट विश्वास को दर्शाता है।राम मंदिर के ‘एनसाइक्लोपीडिया’ और विरक्त भावराम जन्मभूमि आंदोलन के कानूनी और जमीनी संघर्ष में चंपत राय जी की भूमिका रीढ़ की हड्डी की तरह रही है। कानूनी लड़ाई के दौरान वकीलों को अकाट्य तथ्य और ऐतिहासिक साक्ष्य चंपत राय जी ने ही जुटाकर दिए थे, जिसके कारण उन्हें आंदोलन का ‘एनसाइक्लोपीडिया’ (ज्ञानकोश) कहा जाता है। वर्षों के इस लंबे और थका देने वाले संघर्ष के बाद भी जब राम मंदिर बनकर तैयार हुआ, तो उनके भीतर रत्ती भर भी अहंकार नहीं था। वे सदैव श्रेय लेने से पीछे रहे और खुद को केवल रामलला का एक साधारण सेवक मानते रहे। विपरीत परिस्थितियों में भी अडिग धैर्य चंपत राय जी का जीवन आपातकाल (1975) के दौरान 18 महीने जेल में काटने से लेकर राम मंदिर के निर्माण की देखरेख तक, हमेशा अग्निपरीक्षाओं से गुजरा है। हालिया चढ़ावा विवाद के दौरान भी उन्होंने संयम और धैर्य का परिचय दिया। संत समाज का भी हमेशा से यह मानना रहा है कि जिस व्यक्ति ने रामलला के लिए अपनी जवानी और पूरा जीवन खपा दिया, उस पर किसी भी प्रकार का लांछन टिक ही नहीं सकता।एसआईटी की इस क्लीन चिट ने केवल कानूनी औपचारिकता पूरी नहीं की है, बल्कि चंपत राय जी के उसी तपस्वी, बेदाग और निष्काम कर्मयोगी वाले सात्विक स्वरूप को पुनः स्थापित किया है, जिसे अयोध्या का संत समाज और करोड़ों रामभक्त पहले से जानते हैं।

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