मुख्तार अंसारी की जमीन पर बने गरीबों के आशियानों पर नया बवाल, सिंचाई विभाग ने चस्पा किया नोटिस
CM के ड्रीम प्रोजेक्ट पर विभागीय टकराव, LDA और सिंचाई विभाग आमने-सामने

लखनऊ। राजधानी लखनऊ के डालीबाग क्षेत्र में माफिया मुख्तार अंसारी की जब्त की गई करोड़ों रुपये की जमीन पर गरीबों के लिए बनाए गए आवासीय भवन अब नए विवाद में घिर गए हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के ड्रीम प्रोजेक्ट के रूप में प्रचारित इस योजना पर सिंचाई विभाग ने ऐसा नोटिस चस्पा कर दिया है, जिसने प्रशासनिक गलियारों में हलचल मचा दी है।
दरअसल, लखनऊ विकास प्राधिकरण (एलडीए) ने डालीबाग स्थित उस जमीन पर गरीब और जरूरतमंद परिवारों के लिए बहुमंजिला आवासीय भवनों का निर्माण कराया था, जिसे पहले माफिया मुख्तार अंसारी के कब्जे से मुक्त कराया गया था। प्रदेश सरकार ने इसे अपराधियों की अवैध संपत्तियों पर कार्रवाई और जनकल्याण के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया था।
लेकिन अब सिंचाई विभाग ने इन भवनों के बाहर नोटिस लगाकर दावा किया है कि जिस भूमि पर निर्माण किया गया है, वह विभाग की संपत्ति है और भवनों का निर्माण बिना वैधानिक अनुमति के किया गया है। नोटिस में भवनों को “अवैध निर्माण” बताते हुए संबंधित पक्षों से जवाब मांगा गया है।
विभागीय विवाद से मचा हड़कंप
सिंचाई विभाग की इस कार्रवाई के बाद एलडीए, जिला प्रशासन और शासन स्तर पर खलबली मच गई है। जिस परियोजना को सरकार अपराध मुक्त प्रदेश और गरीब कल्याण की मिसाल के तौर पर पेश करती रही है, उसी पर अब सरकारी विभागों के बीच स्वामित्व का विवाद खड़ा हो गया है।
सूत्रों के अनुसार, सिंचाई विभाग का दावा है कि संबंधित भूमि विभाग के अभिलेखों में दर्ज है और बिना विभागीय अनुमति के निर्माण कार्य कराया गया। वहीं एलडीए का कहना है कि सभी आवश्यक प्रक्रियाओं और सरकारी आदेशों के तहत परियोजना विकसित की गई है।
गरीबों में भी बढ़ी चिंता
इन भवनों में आवंटन की प्रक्रिया से जुड़े लोगों और लाभार्थियों के बीच भी चिंता का माहौल है। लोगों का कहना है कि यदि सरकारी विभाग ही एक-दूसरे की जमीन पर अधिकार जता रहे हैं तो भविष्य में आवासों की वैधता और स्वामित्व को लेकर समस्याएं खड़ी हो सकती हैं।
राजनीतिक गलियारों में चर्चा तेज
मामले ने राजनीतिक रंग भी पकड़ लिया है। विपक्षी दल इसे सरकार के विभागों के बीच समन्वय की कमी बता रहे हैं, जबकि भाजपा नेता इसे महज विभागीय अभिलेखों की तकनीकी जांच का विषय बता रहे हैं। हालांकि जिस तरह मुख्यमंत्री के ड्रीम प्रोजेक्ट पर ही अवैध निर्माण का नोटिस लगा है, उसने पूरे मामले को बेहद संवेदनशील बना दिया है।
अब निगाहें शासन के फैसले पर
फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर जमीन का वास्तविक मालिक कौन है? क्या सिंचाई विभाग का दावा सही है या एलडीए ने सभी कानूनी प्रक्रियाओं का पालन किया था? इस विवाद का अंतिम समाधान अब शासन स्तर पर होने वाली जांच और निर्णय पर निर्भर करेगा।
एक ओर माफिया की जमीन पर गरीबों को घर देने की सरकार की महत्वाकांक्षी योजना है, तो दूसरी ओर उसी परियोजना पर अवैध निर्माण का सरकारी नोटिस। ऐसे में डालीबाग का यह मामला प्रशासनिक व्यवस्था और विभागीय समन्वय पर बड़े सवाल खड़े कर रहा है।




